एक नया मकां - अभिनव अशेष


एक नये मकां की बुनियाद पड़ी है
घेरे जिसे,
गगन छूती ईमारतें खड़ी है |
कंक्रिट के शहर में इंट का पेड़ लगने को है,
ना देगा फल, ना छाया पथिक को,
छत इसके बस ठगने को है|
घास ढक गये हैं रेत की चादर से,
कट गये हैं पेड़ नीरादर से|
उस गौ को क्या पता था,
जो चली आई भुख मिटाने को|
जो आई तो मिला बस,
रेत ही रेत खाने को|
मोहल्ले के इकलौते मैदान से
हरियाली छिन गई,
फर्क क्या पड़ता हमें,
कौन सी ये बात नई|
जो खत्म हुए आशियाने परिन्दों के
तो क्या नया है,
न रहे घास - ना पेड़ तो क्या लुट गया है|
अब तो ये शहर ही कंक्रिट में ढलने लगा है,
ज़रा निकल देखो इस धूप में,
बिन पेड़ ये शरीर जलने लगा है|

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